Sunday, May 26, 2019


विष्णुप्रिया तुलसी

स्वास्थ्य विज्ञान में तुलसी की रोगनाशक शक्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। अस्तु, तुलसी के सेवन से होनेवाले लाभों का कुछ दिग्दर्शन कराया जा रहा है-
1. कफ, खांसी, ज्वर, जुकाम, मलेरिया, बुखार इत्यादि में तुलसी का प्रयोग रामबाण औषधि है। अनेक आयुर्वैदिक औषधियों में तुलसी का सम्मिश्रण अधिक लाभप्रद माना गया है।
2. उदर रोग-जैसे अजीर्ण, अपच, दस्त लगने पर, पेट दर्द, मंदाग्नि एवं पेट में कीड़े पड़ने पर तुलसी का सेवन लाभकारी है।
3. बच्चों की बीमारी में-जैसे शीतला निकलने पर, मुंह से दूध निकलने पर, दांत निकलने पर, खांसी, जुकाम, बुखार होने पर तुलसी का उपयोग करना लाभप्रद है।
4. तुलसी का केवल आंतरिक उपयोग ही नहीं बाहरी उपचार भी है। यह फोड़ा, फंुसी, घाव, चर्मरोग, दाद, खुजली, मुंहासे, झांई, बिच्छू एवं ततैया के काटने पर लेप करने से फायदा पहुंचाती है। नाक से खून आने पर (नकसीर में)  तुलसी रस में कपूर मिलाकर कुछ बूंदे नाक में टपका देने से तुरंत लाभ होता है।
5. आंख, कान, नाक, दांत, सिरदर्द इत्यादि एवं यहां तक कि गठिया एवं जोड़ों के दर्द आदि कई बीमारियों में तुलसी का बाह्य उपचार लाभकारी है।
6. तुलसी का सेवन विटामिन ‘ए’, ‘बी’ एवं ‘सी’ की पूर्ति करता है।
7. बालों के असमय झड़ने पर तुलसी एवं आंवला के चूर्ण को पानी में उबालकर सिर धोने से बालों का झड़ना रूक जाता है।
8. तुलसी में एक विशेष प्रकार की गंध है, जिसे मच्छर, खटमल, छछुंदर तथा सांप इत्यादि सहन नहीं कर पाते। अतएव वे तुलसी के पास नहीं आते। तुलसी की गंध से मलेरिया के मच्छर भाग जाते हैं।
9. प्लूरिसी की बीमारी में-(फेफड़ों में पानी भर जाना एवं सांस रूक-रूककर आना, छाती में दर्द रहना) तुलसी के पत्तों का आधा औंस रस (15 ग्राम) जो धीरे-धीरे एक औंस (30 ग्राम) तक बढ़ाया जा सकता है, दिन में दो बार प्रातः एवं सायं (भूखे पेट) लेने में लाभ होता है।
स्व0 डाॅ0 श्रीसंडेसरा गत 25 वर्षों से तुलसी द्वारा विविध बीमारियों का उपचार सेवाभाव से करते आ रहे थे। वे 1. आथ्र्राइटिस, ओस्टियो आथ्र्राइटिस एवं स्नायु दर्द 2. साइनस, 3. टाॅनसिल, 4. किडनी के रोग एवं किडनी में पत्थर होना, 5. शरीर में सूजन, 6. अनैच्छिक मूत्राòाव, 7. सफेद कोढ़, 8. ब्लड कोलेस्ट्रोल, 9. हृदयरोग, 10. ब्लडप्रेसर, 11 एसीडिटी, 15. लकवा 16. दमा, 17. ग्लुकोमा आदि आंख की बीमारियां, 18. नपंुसकता, 19. सिफलिस तथा 10. कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों का केवल तुलसी का प्रयोगकर सफलतापूर्वक उपचार करते थे।
तुलसी सेवन का समय एवं अनुपान
तुलसी सेवन का समय भूखे पेट प्रातःकालीन विशेष उत्तम है। उसके अनुपान में ताजा मीठा दही, गुड़ या शहद का प्रयोग करना चाहिए। तुलसी के ताजे हरे पत्ते 15 से 25 की तादाद में (उम्र के अनुसार) पीसकर अपनी प्रकृति के अनुकूल तीनों में से एक अनुपान पर्याप्त मात्रा में लेकर उसमें मिलाकर खा लिया जाए। आधा घंटा तक कोई भी दूसरी वस्तु नहीं खानी चाहिए।
चरक के मतानुसार तुलसी कभी भी दूध के साथ नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि इससे त्वचारोग होने का भय रहता है। यदि तुलसी के हरे पत्ते प्राप्त न हों तो सुखाकर रखे हुए पत्तों का चूर्ण भी काम में लिया जा सकता है। तुलसी के नियमित सेवन से चाय, काफी, शराब, बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू आदि व्यसन भी दूर होते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि तुलसी में क्षय रोग (टी. वी.) के कीटाणु, मवाद पैदा करनेवाले कीटाणु एवं टाइफायड के कीटाणु को रोकने की अद्भुत शक्ति है। एक समय था जब प्रत्येक हिंदू’कुटंुब में तुलसी-क्यारी या तुलसी का गमला होना आवश्यक माना जाता था। उसके बिना घर में एक कमी महसूस होती थी

Sunday, May 19, 2019


स्वस्थ जीवन जीये 

प्रातः काल जागरण हो। जीवन का प्रारंभ ईश्वर आराधना से करें, योगा करें, फल और साग सब्जियों का सेवन करें। प्रसन्न रहें। यहां किस फल अथवा सब्जी में क्या आवश्यक गुण हैं और उन्हें लेने से किन रोगों में फायदा होता है, इसकी संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है।

धातृफल आंवला



धातृफल के रूप में प्रसिद्ध आंवला विटामिन ‘सी’ का भंडार है। आंवले के रस में अनेक विशेषताएं विद्यमान हैं। यह अमाशय, मस्तिष्क, हृदय को बहुत शक्ति देता है और रक्त को शुद्ध करता है। यह एक समग्र औषधि है। इसके कुछ औषधीय उपयोग अग्रलिखित हैं-
हरड़, बहेड़ा, आंवला-तीनों की बराबर मात्रा का चूर्ण (गुठली निकालकर) ‘त्रिफला’ कहलाता है। सोते समय एक चम्मच त्रिफलाचूर्ण खाकर गरम पानी या दूध लेने से कब्ज दूर होता है।
आंवले का रस या चूर्ण शहद के साथ खाकर ऊपर से दूध पीने से रुका पेशाब खुलकर आता है। एक ग्राम आंवला और 10 ग्राम हल्दी का काढ़ा बनाकर सेवन करने से भी मूत्रा खुलकर आता है तथा गुदामार्ग और मूत्र की जलन नष्ट होती है।
सुखे आंवलों के बारीक चूर्ण में उसके बराबर वजन की पीसी हुई मिसरी मिलाकर किसी कांच के मर्तबान में रख लें। प्रतिदिन सुबह खाली पेट दो चम्मच चूर्ण फांककर पानी पीने से हृदय के समस्त रोगों में चमत्कारी लाभ होता है। 
आंवला के निरंतर सेवन से रक्तवाहिनियां मुलायम और लचीली बनती है तथा रक्तवाहिनियों की दीवारों के कठोर और मोटा हो जाने का दोष  दूर होता है। अतः आंवले का सेवन औषधीय लाभ देनेवाला है।
त्रिफला के गरम काढ़े में शहद मिलाकर पीने से मोटापा कम होता है।
8 ग्राम आंवले का चूर्ण और 1 ग्राम सेंधा नमक  के मिश्रण में मधु मिलाकर सलाई से प्रतिदिन लगाने से रतौंधी रोग नष्ट होता है।
आंवले के रस में हल्दी घिसकर आंखों में काजल की तरह लगाने से कामला रोग से उत्पन्न पीलापन शीघ्र नष्ट होता है।
आंवलों के 10 ग्राम रस में 5 ग्राम मधु और 3 ग्राम पिप्पली का चूर्ण मिलाकर बच्चों को थोड़ा-थोड़ा चटाने से उल्टी बंद हो जाती है।
ताजे आंवलों का 30 ग्राम रस प्रतिदिन सेवन करने से पाचन क्रिया तीव्र होती है त्वचा में निखार आता है। शुष्क आंवलों को जल के साथ पीसकर शरीर पर लगाने के 25-30 मिनट बाद स्नान करने से त्वचा स्वच्छ और स्निग्ध होती है। 
आंवले का चूर्ण घी के साथ मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से असमय ही बाल पकने से सुरक्षा होती है। 
आंवलों का काढ़ा बनाकर उसमें पिप्पली चूर्ण और मधु मिलाकर पीने से श्वास के प्रकोप में रोगी को बहुत लाभ होता है।
आंवले के चूर्ण को 7-8 ग्राम मात्रा में दूध के साथ सेवन करने से आवाज खराब होने
, गला बैठने की विकृति नष्ट हो जाती है।
आंवले के रस में जीरे का चूर्ण और मिश्री मिलाकर सेवन करने से बदहजमी नष्ट होती है। इससे नेत्रादृष्टि भी बढ़ती है।
आंवला-चूर्ण को पानी में भिंगाकर बाल धोने से रूसी तथा खाज दूर होता है। इस पानी से मसलकर मुंह धोने से नए मुंहासे नहीं निकलते हैं तथा पुराने नष्ट हो जाते हैं।  
सुबह-शाम एक चम्मच त्रिफला चूर्ण शहद के साथ सेवन करने से खून की खराबी दूर  होती है।
आंवले के रस में सरसों तेल मिलाकर मसूड़ों पर मलने से पायरिया की विकृति नष्ट होती है।ृ